श्री हरबी सती दादी जी का संक्षिप्त जीवन परिचय
सर्वप्रथम श्री नारायणी जिन्हें हम श्री राणी सती जी के नाम से जानते हैं एवं उनके बाद उनकी ही कई विभूतियों ने ना ना रूप धारण कर अवतार लेकर कई वंश कुल आदि का उद्धार किया है। उसी क्रम में सिंघल कुल उद्धारिणी श्री हरबी सती जी का भी विशेष स्थान है।
जिनका जीवन नारी समाज को एक नई दिशा एवं सत्य सन्मार्ग की प्रेरणा देता है। श्री हरबी सती जी के जीवन पर हम एक संक्षिप्त परिचय लोकमत के अनुसार देने का प्रयास कर रहे है। श्री हरबी जी का जन्म विक्रम संवत् 1460 में ज्यैष्ठ सुदी नवमी को सुजानगढ़ के निकट ग्राम गाड़ौदा के एक सुजान वैश्य कुल में हुआ था। आपका जन्म अपने आप में शक्ति की कृपा का ही वरदान था।
आप जन्म से ही नारी समाज एवं संसार के लिए एक उदाहरण बनकर प्रकट हुई, बाल्यावस्था से ही आप कई चमत्कार करती हुई युवा अवस्था को प्राप्त हुई थी। सम्वत् 1476 में अपने ही इच्छा अनुसार पति जो कि फतेहपुर तहसील के जालुका ग्राम के एक उच्च अग्र कुल के थे के साथ शुभ तिथि माघ पंचमी (बसंत पंचमी) को विवाह सम्पन्न हुआ। आपने अपने पीहर तथा ससुराल दोनों ही घर कुल को धन्य कर अपना वैवाहिक जीवन पूर्णनिष्ठा, धर्म व एकाग्र हो व्यक्त किया।
लोक कथा के अनुसार एक दफा जब आप अपने मामा की लड़की के विवाह हेतु अपने ननिहाल नवलगढ़ पधारी हुई थी तब विवाह पश्चात् आपको लेने के लिए आपके स्वामी कुँवर जी को आज्ञा दी गई। किन्तु फतेहपुर और नवलगढ़ के मध्य घोर बीहड़ जंगल होने के कारण आपके सास-ससुर ने एक ब्राह्मण सूत को उनके साथ साथी बनाकर भिजवाया था। किन्तु होनी बलवान, विधि के विधानवश जो ब्राह्मण कुँवरजी के साथ भिजवाया गया था बीच मार्ग में उसकी बुद्धिमता को लालच हुआ।
कुँवर की स्वर्ण से सजी देह तथा साथ ही रथ में रखे वस्त्राभूषणों को देखकर ब्राह्मण सूत अपना आपा खो बैठा तथा उसने समस्त माया आदि को लूटने का प्रयोजन बना लिया। जब कुँवर ने अपने साथी के हृदय में परिवर्तन देखा तो विरोध स्वरूप आपने उससे युद्ध किया किन्तु पापी कुँवर से उम्र में अधिक बड़ा एवं बलवान होने के कारण उस युद्ध में जीत गया। छल से युद्ध जीत कर जब उसने कुँवर पर विजय प्राप्त कर ली तब कुँवर द्वारा प्राण तजने के बाद उसने वही उस घोर बीहड़ के क्षेत्र में एक खैर वृक्ष की मूल में कुँवर की देह दबा कर ऊपर से णमूल आदि से उसे छुपा दिया।
तब विचार किया कि अब श्री हरबी जी को भी उनके ननिहाल से लाकर उनके भी आभूषण आदि लूट लूं। ऐसा विचार कर वो नवलगढ़ पहुंचा। वहां पहुंचने पर उसने जैसे ही हरबी बाई के द्वार पर कदम रखा, भवन भीतर से श्री हरबी बाई द्वारा विलाप एवं क्रोध वश चीख सुनकर समस्त परिवार व ब्राह्मण भी बड़ा भयभीत हुआ। मामा-मामी ने जब हरबी बाई को इतना क्रोधित देखा तब उन्हें एक कमरे में बंद कर बाहर से सांकल लगा दी। तब श्री हरबी बाई ने निज सत का परिचय दिखलाते हुए द्वार खोल दिया एवं सम्पूर्ण परिवार को ब्राह्मण द्वारा किए गए कुकृत्य का बोध करवाया।
श्री हरबी जी की बातें सुनकर उस ब्राह्मण ने घोर विरोध जताया। तब निज महिमा दिखलाते हुए आप सारे परिवार व ग्राम वासियों सहित उस स्थान पर जा पहुंची जिस स्थान पर ब्राह्मण द्वारा कुंवर जी की देह छुपाई गई थी। ब्राह्मण द्वारा किए गए कृत्य को देखकर समस्त ग्रामवासियों ने उसे दण्ड स्वरूप मारना चाहा तब श्री हरबी जी ने ब्रह्म हत्या का बोोध कराते हुए उस ब्राह्मण को लोगों की पकड़ से मुक्त कराया। उसे उसके समस्त पापों का ज्ञान कराते हुए जब मुक्त किया तो वह खुद शर्मसार होता हुआ एक कुएं में कूद गया एवं अपना जीवन समाप्त कर निज करनी का फल पाया।
उधर कुंवर जी की देह को देखकर श्री हरबी बाई ने वही उसी स्थान पर सती हो जाने का निश्चय किया तथा उसी खैर वृक्ष के समीप चिता बनवाकर आप सम्वत् 1477 कार्तिक शुक्ल चौदस को कुंवर जी के साथ श्रीधाम को सिधारी। अपने परिवार एवं ग्रामवासियों को विलाप करता देख आपने चिता से उठ कर सबको दर्शन देते हुए सभी लोगों की भ्रांतियों को दूर करते हुए अपने अवतार होने का ज्ञान कराया तथा समाज को नारी को साधारण न मानकर अपितu सत्य की परिचायक मान कर रहने का ज्ञान कराया।
आपने सती होते समय सभी को बताया कि नारी जननी है, शक्ति है इसी कारण माँ के लिए उसके सभी पुत्र एक समान हैं। किन्तु ब्राह्मण द्वारा किए गए कुकृत्य को एवं मेरी जीवन लीला को याद करते हुए युगों युगों तक के लिए मैं अपनी सेवा से ब्राह्मण जाति को वंचित करती हूं तथा पीत (पीली) वस्तुओं को भी वंचित करती हूं। तब से लेकर आज तक श्री हरबी जी के मण्ड एवं मंदिर की सेवा ब्राह्मण द्वारा नहीं की जाती किन्तु माँ तो माँ हैं वे सभी का न्याय एवं भरण पोषण एक समान ही करती हैं।
जिस स्थान पर श्री हरबी बाई सati हुए उस स्थान के समीप एक खैर वृक्ष था जिसके मूल कुवंर जी की deh दबा दी गई थी वो वृक्ष आज भी श्री दिशनाऊ शक्ति धाम में मौजूद है। जिसकी परिक्रमा एवं मान्यता से कई प्रकार के रोग बाधा आदि दूर होते हैं। कई वर्षों से लेकर आज तक भी श्री हरbi सती जी अपने द्वार पर आने वाले याचक का लालन-पालन एवं न्याय एक समान करती हैं।
नारी का सती होना समाज के लिए कलंक की बात है इसलिए हम सती प्रथा का विरोध करते हैं। जो शक्ति नारी रूप में अवतरित हुई तथा नारी समाज को अपनी लीला द्वारा कर्तव्य एवं धर्म परायणता का ज्ञान कराये वो कोई साधारण नारी नहीं हो सकती।